शहर में ठेका सफाईकर्मियों की पार्षदों द्वारा की जा रही मॉनिटरिंग की निगम अधिकारियों ने पोल खोलकर रख दी। दूसरे दिन गुरुवार को नए कोटा के 3 वार्ड में जांच की तो एक भी ठेका श्रमिक कहीं काम करता हुआ नहीं पाया गया। यहां तक कि उनकी हाजिरी का रजिस्टर भी नहीं मिला, जिससे साबित होता कि कितने श्रमिक आए और कितने गैरहाजिर रहे।
उपायुक्त अशोक त्यागी व राजेश डागा सुबह सेक्टर कार्यालय 10 पर पहुंच गए। यहां पर स्थायी श्रमिकों का रजिस्टर तो मिला, लेकिन ठेका श्रमिकों का रजिस्टर नहीं मिला। यहीं पर स्वास्थ्य अधिकारी मुकेश वर्मा व इंसपेक्टर विनय जैन को बुलाया गया। इसके बाद उन्होंने पार्षद राखी गौतम के वार्ड 22, सोनू गौतम के वार्ड 51 तथा ध्रुव राठौड़ के वार्ड 23 में पहुंचकर जांच शुरू कर दी।
लोगों से जानकारी की तो पता चला कि ठेका श्रमिक तो काम करने आते ही नहीं। उन्हें केवल घर-घर कचरा उठाने वाले डेरे के ही श्रमिक मिले। 11 स्थायी श्रमिकों में से 3 मिले। वहीं, भास्कर ने भी 26-27 नवंबर को सेक्टर कार्यालयों पर छापा मारकर सफाई के झूठ का खुलासा किया था।
सेक्टर कार्यालय पर रजिस्टर क्यों नहीं?
दोनों अधिकारियों ने जब इंसपेक्टर विनय जैन से ठेका श्रमिकों के रजिस्टर के बारे में पूछा तो उन्होंने इसे पार्षदों के पास होना बताया। उनसे पूछा गया कि वे कैसे मानिटरिंग करते हैं क्या बीट के अनुरूप यहां श्रमिक लगते हैं, तो वे चुप हो गए।
5 लाख रुपए हर महीने 101 श्रमिकों के वेतन पर खर्च
इन तीनों वार्ड में 101 ठेके के श्रमिक काम करते हैं। पुरानी न्यूनतम मजदूरी 166 रुपए रोज के हिसाब से एक माह का वेतन 5 लाख 2 हजार 980 रुपए होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां पर आधे श्रमिक भी नजर नहीं आते। इनका भेद नहीं खुले इसलिए ये हाजिरी रजिस्टर भी अपने पास रखते हैं। निगम ने पहले ही इनको अधिकार दिया हुआ है कि इनके प्रमाणपत्र देने पर ही ठेकेदार का भुगतान होगा।
गलियों में हो रही थी गंदगी
हमने सुबह लगभग 2 घंटे तक इन तीनों वार्ड की जांच की। एक भी ठेका श्रमिक हमें काम करता हुआ नहीं पाया गया। एसआई व इंसपेक्टर भी साथ थे, ताकि वह बता सकें कि कहां सफाई श्रमिक काम कर रहे हैं। एक भी वार्ड में ठेका श्रमिक नहीं मिला। यह काफी गंभीर है। इसके अलावा कुछ इलाकों में गंदगी भी मिली है। मैं अपनी रिपोर्ट आयुक्त को दूंगा, कार्रवाई वे ही करेंगे। -अशोक त्यागी, उपायुक्त
पार्षद बोले- हमें मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया
पार्षद सोनू गौतम, ध्रुव राठौड़ व राखी गौतम ने उपायुक्तों की जांच को ही गलत बताया है। उन्होंने कहा कि रजिस्टर तो मॉनिटरिंग के लिए रखा जाता है। ताकि लोगों की शिकायत पर श्रमिकों को भेजा जा सके। उपायुक्त कहते हैं कि एक भी श्रमिक नहीं मिला। क्या यह संभव है। यदि ऐसा है तो हमें बुलाते, हम बताते कहां पर काम कर रहे हैं श्रमिक। यह कार्रवाई पार्षदों का मनोबल गिराने वाली है।
सूरत में भी ऐसा ही सिस्टम, लेकिन कारगर
देश के स्वच्छ शहरों में शुमार सूरत में भी सफाई के लिए स्थायी व अस्थायी कर्मचारी हैं। अस्थायी कर्मचारियों के जिम्मे रात की सफाई है। यहां भी कोटा की तरह डबल मॉनिटरिंग सिस्टम है। जिस ठेकेदार ने कर्मचारी लगा रखे हैं वो उन्हें चैक करता है और फिर निगम के सेनेटरी इंस्पेक्टर व हेल्थ ऑफिसर द्वारा चैकिंग की जाती है।
वहां जो सड़क पर नजर नहीं आया उसका वेतन कटता है। कोटा में भी यही सिस्टम है, लेकिन अंतर ये है कि वहां कारगर है और यहां केवल कागजों में सुपरविजन होता है। अस्थायी कर्मचारियों का हाजरी रजिस्टर किसके पास होता है और हाजरी कौन लेता है, निगम को इसका पता नहीं होता। निगम के अधिकारी कभी जाते हैं तो रजिस्टर ही नहीं मिलता।
उपायुक्त अशोक त्यागी व राजेश डागा सुबह सेक्टर कार्यालय 10 पर पहुंच गए। यहां पर स्थायी श्रमिकों का रजिस्टर तो मिला, लेकिन ठेका श्रमिकों का रजिस्टर नहीं मिला। यहीं पर स्वास्थ्य अधिकारी मुकेश वर्मा व इंसपेक्टर विनय जैन को बुलाया गया। इसके बाद उन्होंने पार्षद राखी गौतम के वार्ड 22, सोनू गौतम के वार्ड 51 तथा ध्रुव राठौड़ के वार्ड 23 में पहुंचकर जांच शुरू कर दी।
लोगों से जानकारी की तो पता चला कि ठेका श्रमिक तो काम करने आते ही नहीं। उन्हें केवल घर-घर कचरा उठाने वाले डेरे के ही श्रमिक मिले। 11 स्थायी श्रमिकों में से 3 मिले। वहीं, भास्कर ने भी 26-27 नवंबर को सेक्टर कार्यालयों पर छापा मारकर सफाई के झूठ का खुलासा किया था।
सेक्टर कार्यालय पर रजिस्टर क्यों नहीं?
दोनों अधिकारियों ने जब इंसपेक्टर विनय जैन से ठेका श्रमिकों के रजिस्टर के बारे में पूछा तो उन्होंने इसे पार्षदों के पास होना बताया। उनसे पूछा गया कि वे कैसे मानिटरिंग करते हैं क्या बीट के अनुरूप यहां श्रमिक लगते हैं, तो वे चुप हो गए।
5 लाख रुपए हर महीने 101 श्रमिकों के वेतन पर खर्च
इन तीनों वार्ड में 101 ठेके के श्रमिक काम करते हैं। पुरानी न्यूनतम मजदूरी 166 रुपए रोज के हिसाब से एक माह का वेतन 5 लाख 2 हजार 980 रुपए होता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां पर आधे श्रमिक भी नजर नहीं आते। इनका भेद नहीं खुले इसलिए ये हाजिरी रजिस्टर भी अपने पास रखते हैं। निगम ने पहले ही इनको अधिकार दिया हुआ है कि इनके प्रमाणपत्र देने पर ही ठेकेदार का भुगतान होगा।
गलियों में हो रही थी गंदगी
हमने सुबह लगभग 2 घंटे तक इन तीनों वार्ड की जांच की। एक भी ठेका श्रमिक हमें काम करता हुआ नहीं पाया गया। एसआई व इंसपेक्टर भी साथ थे, ताकि वह बता सकें कि कहां सफाई श्रमिक काम कर रहे हैं। एक भी वार्ड में ठेका श्रमिक नहीं मिला। यह काफी गंभीर है। इसके अलावा कुछ इलाकों में गंदगी भी मिली है। मैं अपनी रिपोर्ट आयुक्त को दूंगा, कार्रवाई वे ही करेंगे। -अशोक त्यागी, उपायुक्त
पार्षद बोले- हमें मौके पर क्यों नहीं बुलाया गया
पार्षद सोनू गौतम, ध्रुव राठौड़ व राखी गौतम ने उपायुक्तों की जांच को ही गलत बताया है। उन्होंने कहा कि रजिस्टर तो मॉनिटरिंग के लिए रखा जाता है। ताकि लोगों की शिकायत पर श्रमिकों को भेजा जा सके। उपायुक्त कहते हैं कि एक भी श्रमिक नहीं मिला। क्या यह संभव है। यदि ऐसा है तो हमें बुलाते, हम बताते कहां पर काम कर रहे हैं श्रमिक। यह कार्रवाई पार्षदों का मनोबल गिराने वाली है।
सूरत में भी ऐसा ही सिस्टम, लेकिन कारगर
देश के स्वच्छ शहरों में शुमार सूरत में भी सफाई के लिए स्थायी व अस्थायी कर्मचारी हैं। अस्थायी कर्मचारियों के जिम्मे रात की सफाई है। यहां भी कोटा की तरह डबल मॉनिटरिंग सिस्टम है। जिस ठेकेदार ने कर्मचारी लगा रखे हैं वो उन्हें चैक करता है और फिर निगम के सेनेटरी इंस्पेक्टर व हेल्थ ऑफिसर द्वारा चैकिंग की जाती है।
वहां जो सड़क पर नजर नहीं आया उसका वेतन कटता है। कोटा में भी यही सिस्टम है, लेकिन अंतर ये है कि वहां कारगर है और यहां केवल कागजों में सुपरविजन होता है। अस्थायी कर्मचारियों का हाजरी रजिस्टर किसके पास होता है और हाजरी कौन लेता है, निगम को इसका पता नहीं होता। निगम के अधिकारी कभी जाते हैं तो रजिस्टर ही नहीं मिलता।
Job
Bhai mera mara hai dard bhi mujko hai